लोक चेतना के साथ शास्त्रीय संगीत का सुंदर समन्वय कर इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय ने ललित कला के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दी छत्तीसगढ़ को पहचान - द नेक्स्ट न्यूज़

  • 20-December-2019

खैरागढ न्यूज़ । इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय में लोक और शास्त्र का सुंदर समन्वय है। अपनी लोक चेतना के साथ शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देने का यह यशस्वी उपक्रम छत्तीसगढ़ को ललित कला के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खड़ा करता है। यह संबोधन कुलाधिपति एवं राज्यपाल सुश्री अनुसुईया उईके ने इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के पंद्रहवें दीक्षांत समारोह के अवसर पर व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि मेरा सौभाग्य है कि संगीत के क्षेत्र में जाकिर हुसैन जी जिन्होंने भारत का नाम पूरी दुनिया में रोशन किया है। मैंने देखा कि जो सहजता और सरलता मैंने आपके भीतर देखी, वहीं आपकी शक्ति है। उनकी इस सहजता से विद्यार्थियों को सीखना चाहिए। इसी भावना ने उन्हें इतना बड़ा मुकाम दिया है। उन्होंने कहा कि छात्र जीवन में मैंने जो सीखा, उसके बुनियाद पर मैं आपके बीच खड़ी हूं। जैसा कि मैं श्री जाकिर हुसैन जी को सुन रही थी, उन्होंने बताया कि 3 साल की आयु से वे संगीत सीख रहे हैं और अब भी शिष्यवृत्ति उनमें मौजूद है। यह सीखने की बात है। ऐसा ही आचरण हम सबका होना चाहिए। यह हमारे लिए गौरव की बात है कि इस छोटे से शहर में लघु भारत दिखता है। हम स्वर्गीय राजा वीरेंद्र बहादुर जी एवं रानी पद्मावती देवी जी के प्रति आभारी हैं, जिन्होंने ललित कला के प्रति समर्पित यह संस्थान हमें सौगात के रूप में दिया।


इस अवसर पर पद्मश्री एवं पद्मभूषण से सम्मानित देश के जाने माने तबला वादक श्री जाकिर हुसैन को मानद डॉक्टरेट की उपाधि से कुलाधिपति सुश्री अनुसुईया उईके ने सम्मानित किया। इस मौके पर श्री हुसैन ने कहा कि इस सम्मान से मैं अभिभूत हूं। मेरे पिता ने मुझे सिखाया कि हमेशा अपने भीतर शिष्य की प्रवृत्ति रखना। सीखने की ललक रखना और मैं हमेशा उनकी यह बात सूक्त वाक्य के रूप में रखता हूं। उन्होंने कहा कि दुनिया में आने पर पहली सांस से लेकर आखरी सांस तक हर क्षण सीखना है। परफेक्शन प्राप्त नहीं किया जा सकता, केवल हर क्षण इसकी कोशिश होनी चाहिए। बुद्ध जैसा निर्वाण दुर्लभ है। उन्होंने कहा कि जीवन के कण-कण में संगीत है। जीवन के इस गीत को लय में गा लें तो इससे बेहतर कुछ नहीं। उल्लेखनीय है कि श्री हुसैन को 2 बार ग्रेमी पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने 3 वर्ष की अल्पायु में ही अपने पिता उस्ताद अल्लारक्खा खान से तबले की तालीम गृहण की। इस मौके पर प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं को स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। साथ ही शोध छात्र-छात्राओं को भी डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई। 


इस मौके पर मुख्य अतिथि सीसीआरटी नई दिल्ली के निदेशक श्री ऋषि वशिष्ठ ने कहा कि कलाएं हमें ताकत देती हैं कि हम अपने शर्तों पर जीवन जी सकें। हममें दृढ़ता और विश्वास पैदा करती हैं। कला हमारे जीवन के अंधकार को दूर करती हैं और जीवन के असल मूल्य सिखाती है। इस मौके पर कुलपति मांडवी सिंह ने कहा कि 1953 में महाराज श्री वीरेंद्र बहादुर एवं रानी श्रीमती पद्मावती देवी ने इस संस्थान का पौधा बोया था। आज उनकी दूरदर्शिता से यह संस्थान संगीत एवं ललित कला को सहेजने संवर्धित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यहां 20 से अधिक राज्यों के 2000 से अधिक छात्र-छात्रा पढ़ रहे हैं। इनमें विदेशी छात्र भी हैं। उन्होंने कहा कि यह विश्वविद्यालय लता मंगेशकर, सत्यजीत रे, तीजन बाई जैसी विभूतियों के आगमन का साक्षी रह चुका है और अब इसमें उस्ताद जाकिर हुसैन जैसे विशिष्ट अतिथि भी शामिल हो गए हैं। आभार व्यक्त कुलसचिव श्री पीएस धु्रव ने किया। इस अवसर पर राज्यपाल के सचिव श्री सोनमणि बोरा, संभागायुक्त दुर्ग श्री दिलीप वासनीकर, राजनांदगांव कलेक्टर श्री जयप्रकाश मौर्य सहित विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, अधिकारी-कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं व आम नागरिक उपस्थित थे।


Related Articles

Comments
  • No Comments...

Leave a Comment